Saturday, June 16, 2012
रौशनी से भला जुगनू ये निकलता क्यों है
रौशनी से भला जुगनू ये निकलता क्यों है
अक्स इसका मेरी आँखों में बिखरता क्यों है
गुफ्तुगू में जो तेरा ज़िक्र कभी आ जाए
दर्द तूफ़ान की तरह दिल में मचलता क्यों है
रात भर चाँद ने चूमी है तेरी पेशानी
उसको अफ़सोस है सूरज ये निकलता क्यों है
किस लिए फैला है हसरत का धुवां चारों तरफ
दिल से एक आह का शोला ये निकलता क्यों है
सोचती रहती हूँ फुर्सत में यही मैं "सीमा "
काम जो होना है आखिर वोही टलता क्यों है
Wednesday, March 28, 2012
वो कुछ न कुछ तो छुपा रहा है

वो कुछ न कुछ तो छुपा रहा है
हंसी जो लब पर सजा रहा है
हंसी जो लब पर सजा रहा है
वो मेरे आँखों की प्यास बन कर
मुझी से नज़रें चुरा रहा है
उसे मैं अपना कहूँ तो कैसे
जो दिल पे नश्तर चला रहा है
मेरे ख्यालों की चांदनी में
वो चाँद बन कर समां रहा है
वो चाँद बन कर समां रहा है
मेरी वफ़ा पे यकीं नहीं है
जो मुझ से दमन छुड़ा रहा है
जो मेरी जुल्फों की छाँव में था
घटायें बनकर वो छ रहा है
जितना करती हूँ दूर उस को
वो पास उतना ही आ रहा है
ये चाँद सूरज ज़मीन
तारे
कोई तो इनको चला रहा है
रूठ जाएँगी सारी खुशियाँ
उदास हो कर वो जा रहा है
पनाह में ले ले उसको "सीमा"
बिछड के तुझ से जो जा रहा है
बिछड के तुझ से जो जा रहा है
Tuesday, November 1, 2011
"अय्याम ने"

"अय्याम ने" 

मैं यहाँ बेचैन हूँ तुम वहाँ बेताब हो,
किस जगह लाकर मिलाया है हमें अय्याम ने...
हों कई ऐसे भी जो रहते रहे हो इस तरह,
और रुबाई हो लिखी कोई उमर खय्याम ने...
रात भर जागा किए हैं तेरी यादों के तुफैल,
कितने ख्वाबों को बुना है इस दिले नाकाम ने...
तेरे आने की ख़बर हैं दिल में जागी है उमंग,
कितने दीपक ला जला डाले हैं मेरी शाम ने...
याद करने को नहीं आता है दिल दुःख के वह दिन,
और क्यों तमको नहीं लिखा है मेरे नाम ने....
फिर भि फरमाइश किया है उसको मेरी जान ने,
और किया बदनाम दानी को है उसके काम ने...
अब तड़पता दिल है दानी का बहुत उसके लिये,
कह रहा है तुमसे आ जाओ अचानक मेरे सामने...
Monday, August 2, 2010
Friday, June 18, 2010
"जूनून-ऐ-इश्क"


"जूनून-ऐ-इश्क "
जूनून की बात निकली है तो मेरी बात भी सुन लो,
जूनून-ऐ-इश्क सच्चा है तो फिर हारा नहीं करता
मुक़द्दस है जगह वो क्यूंकि घर माशूक का है वो,
कोई मजनूँ कभी भी अपना दिल मारा नहीं करता
तजस्सुस यह के वोह बोलेगा सच या झूट बोलेगा
वो मजनू है और उसके दिल में ही है बसी लैला,
हर एक हूरे नज़र पर अपना दिल वारा नहीं करता

http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/09/blog-post_7453.html
Wednesday, February 24, 2010
Sunday, January 10, 2010
"नयी"



"नयी"
"ज़िंदगी" हो तुम्हारे साथ नयी,
दिन नया हो हमारी रात नयी.....
दिन नया हो हमारी रात नयी.....
पिछली बातों को भूल जाएँ हम,
जब भी हो बात सारी बात नयी.......
अब न आयें वो दिन गुज़र जो गए,
हर घड़ी हो तुम्हारे साथ नयी........
हम पुराने रिवाज ठुकरादें,
सारे रिश्तों की सारी जात नयी ........
वो जो तुमसे है दिल लगा बैठा ,
तेरे घर लाएगा बारात नयी....
Friday, January 1, 2010
"यूँही बस


तुम मुझ से बोलती रहीं ...चुप चाप यूँही बस,
जख्मो पे हाथ फेरती चुपचाप यूँ ही बस
क्यों लग रहा है दिल को तुम हो आसपास ही ,
आ जाओ मेरे सामने ... चुप चाप यूँ ही बस.
कुछ तो ज़रूर है जो हमे हो रहा है यूं,
तुम ही ज़रा बताओ ना ... चुप चाप यूँ ही बस.
तुमको भी क्या वही हुआ जो हमको हो गया,
खामोश इंकलाब सा ...चुप चाप यूँ ही बस.
अब तक कहाँ थी क्यों नहीं मुझको मिली कभी ,
मैं सोचता ही जा रहा ...चुप चाप यूँ ही बस.........
Saturday, October 24, 2009
" मैं दूंढ लाता हूँ"



" मैं दूंढ लाता हूँ"
अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....
जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ"
किसी बस्ती की गलियों में किसी सहरा के आँगन में ...
तुम्हारी खुशबुएँ फैली जहाँ भी हों मैं जाता हूँ
तुम्हारे प्यार की परछाइयों में रुक के जो ठहरे ............
सफर मैं जिंदिगी का ऐसे ख्वाबों से सजाता हूँ
तुम्हारी आरजू ने दर बदर भटका दिया मुझको ............
तुम्हारी जुस्तुजू से अपनी दुनिया को बसाता हूँ
कभी दरया के साहिल पे कभी मोजों की मंजिल पे........
तुम्हें मैं ढूँडने हर हर जगह अपने को पाता हूँ
हवा के दोष पर हो कि पानी की रवानी पे .............
तुम्हारी याद में मैं अपनी हस्ती को भुलाता हूँ
मुझे अब यूँ ने तड़पाओ चली आओ चली आओ ......
चली आओ चली आओ चली आओ चली आओ
अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....
जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ"...........
Wednesday, September 9, 2009
"आज"



"आज"
जैसे कुछ दिल बदल गया हो आज,
यार ख़ुद से बहल गया हो आज,
यार ख़ुद से बहल गया हो आज,
तुम अगर सुन नही रहे हो बात,
मेरा दिल क्यूँ मचल गया हो आज ?
क्या पता खत लिख नही पाता,
या नई चाल चल गया हो आज,
क्यूँ ये मौसम भी खुशगवार नही,
हवा का रुख बदल गया हो आज !
एक नशा था उतर नही पाता,
तेरे रुख से संभल गया हो आज,
क्यूँ ये मुझ से ही हो नहीं पाता,
कोई दिल से निकल गया हो आज !
तुम को चाहा है तुम से प्यार किया,
प्यार सदियों का मिल गया हो आज,
Tuesday, July 14, 2009
"तुम्हें पा रहा हूँ"



"तुम्हें पा रहा हूँ"
तुम्हें खो रहा हूँ तुम्हें पा रहा हूँ,
लगातार ख़ुद को मैं समझा रहा हूँ....
ना जाने अचानक कहाँ मिल गयीं तुम,
मैं दिन रात तुमको हे दोहरा रहा हूँ........
शमा बन के तुम सामने जल रही हो,
मैं परवाना हूँ और जला जा रहा हूँ ....
तुम्हारी जुदाई का ग़म पी रहा हूँ,
युगों से मैं यूँ ही चला जा रहा हूँ...
अभी तो भटकती ही राहों में उलझा,
नहीं जानता मैं कहाँ जा रहा हूँ....
नज़र में मेरे बस तुम्हारा है चेहरा,
नज़र से नज़र में समां जा रहा हूँ......
बेकली बढ़ गयी है सुकून खो गया है,
तुझे याद कर मैं तड़प जा रहा हूँ..........
कहाँ हो छुपी अब तो आ जाओ ना तुम,
मैं आवाज़ देता चला जा रह हूँ ........
Tuesday, May 5, 2009
"मैं"


"मैं "
कलमों के टूटे ढेर थे मैं छेड़ता रहा,
लफ्जों के हेर फेर ने समझा नहीं मुझे....
कच्ची थी सोंधी ख़ाक में मैं बोलता रहा ,
चाकों के एतबार ने चूप्का किया मुझे...
लौहएमकान का का राज़ था क्यों फाश हो गया ,
कुत्बों के इन्तखाब ने रुसवा किया मुझे ... ..
खारे -चमन था लेकिन चुप चाप जी गया ,
कलियों की बेकली ने तड़पा दिया मुझे ....
Tuesday, April 21, 2009
"निगाहे-नाज़"

बेज़ारी जान की थी या,
किसी गम की गीरफ्तारी थी,
अंधेरी रात मे भी,
" रोशन रूखे- यार देखा"
शायद ये निगाहे-नाज़ की,
" बीमारी थी"
(बेज़ारी - उदासीनता )
(रूखे- यार - प्रेमिका का चेहरा)
http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/09/blog-post_13.html
Tuesday, April 7, 2009
"गीत"
"गीत"मैंने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिखे
आज दुनिया की नज़र उनका पता पाएगी,
किस तरह चाहा है पूजा है सराहा है तुम्हें
प्यार की दुनिया में तारीख लिखी जायेगी..
तेरे चेहरे की तमानत ये सदा देती है
प्यार खिलता है तो चेहरे से अयाँ होता है
कोई जब जन्मो के रिश्तों से बंधा होता है
उसका सम्बन्ध हर एक गाम बयाँ होता है..
Sunday, December 28, 2008
Friday, December 26, 2008
"तु जो मिल जाए"
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