Tuesday, May 5, 2009

"मैं"







"मैं "

कलमों के टूटे ढेर थे मैं छेड़ता रहा,
लफ्जों के हेर फेर ने समझा नहीं मुझे....

कच्ची थी सोंधी ख़ाक में मैं बोलता रहा ,
चाकों के एतबार ने चूप्का किया मुझे...

लौहएमकान का का राज़ था क्यों फाश हो गया ,
कुत्बों के इन्तखाब ने रुसवा किया मुझे ... ..

खारे -चमन था लेकिन चुप चाप जी गया ,
कलियों की बेकली ने तड़पा दिया मुझे ....

Tuesday, April 21, 2009

"निगाहे-नाज़"


"निगाहे-नाज़"

बेज़ारी जान की थी या,
किसी गम की गीरफ्तारी थी,
अंधेरी रात मे भी,
" रोशन रूखे- यार देखा"
शायद ये निगाहे-नाज़ की,
" बीमारी थी"

(बेज़ारी - उदासीनता )
(रूखे- यार - प्रेमिका का चेहरा)
(निगाहे-नाज़ - चंचल आँख)

http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/09/blog-post_13.html

Tuesday, April 7, 2009

"गीत"

"गीत"


मैंने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिखे
आज दुनिया की नज़र उनका पता पाएगी,

किस तरह चाहा है पूजा है सराहा है तुम्हें
प्यार की दुनिया में तारीख लिखी जायेगी..
तेरे चेहरे की तमानत ये सदा देती है
प्यार खिलता है तो चेहरे से अयाँ होता है

कोई जब जन्मो के रिश्तों से बंधा होता है
उसका सम्बन्ध हर एक गाम बयाँ होता है..


Sunday, December 28, 2008

"तेरा ना होना"


"तेरा ना होना"

तेरा ना होना
सर्पदंश सा विषैला
सांसे भरता
"जीवित "
एक अभिशाप

Friday, December 26, 2008

"तु जो मिल जाए"


"तु जो मिल जाए"

"कब से खोजूँ तुझे,
गलियों में औ चौराहों पर,
तू जो मिल जाए, तेरे शहर...
को अपना कह दूँ
रवाना हो चला है वक्त,
जनाज़े की तरह,
दे ज़रा वक़्त, के फिर से...
तुझे मिलना कह दूँ
मेरी जाँ याद तेरी,
आ के है तड़पाती बहुत,
तू जो ,मिलती है हक़ीक़त...
को मैं सपना कह दूँ

Thursday, December 4, 2008

'यह हमारा प्रण है !"

यह हमारा प्रण है !!
दिनेशराय द्विवेदी जी द्वारा प्रेरित

Wednesday, November 19, 2008

भरोसे से

"भरोसे से"

वक्त के जंगल के ये झंखाड़,
और वो झाड़ियाँ
साफ़ दिखने में ख़लल डालें,

जो बनकर गुत्थियाँ
चंद क़दमों पर नज़र आएँगे,

फिर से हम ज़रूर
बस भरोसे से हटाना है,
तुम्हें बेज़ारियाँ.........

(बेज़ारियाँ = विमुखता, क्रोध, नाख़ुशी)