Tuesday, April 21, 2009

"निगाहे-नाज़"


"निगाहे-नाज़"

बेज़ारी जान की थी या,
किसी गम की गीरफ्तारी थी,
अंधेरी रात मे भी,
" रोशन रूखे- यार देखा"
शायद ये निगाहे-नाज़ की,
" बीमारी थी"

(बेज़ारी - उदासीनता )
(रूखे- यार - प्रेमिका का चेहरा)
(निगाहे-नाज़ - चंचल आँख)

http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/09/blog-post_13.html

22 comments:

जितेन्द़ भगत said...

लाजवाब!

Anil Pusadkar said...

roz nai baat, roz naya khayal,kamal hai

rakhshanda said...

bahut khoobsoorat hai, very nice

"SURE" said...

" रोशन रूखे- यार देखा"
बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ है,
भावपूर्ण बधाई

मोहन वशिष्‍ठ said...

बेज़ारी जान की थी या,
किसी गम की गीरफ्तारी थी,

सीमा जी एक बात बताओ कि इतनी गहरी बात दिल में आई कैसे गजब पंक्तियां थोडा और लिखने का प्रयास करो अच्‍छा लिखोगे

हा हा हा

निशा said...

बहुत खूब

G M Rajesh said...

nigaahe-naj patharaa si gayin un par
ye mahbooba bhi to na thi
bejaari pata nahi kab khatam ho gayi
laga muddat se isi rukhe-yaar ki talaash thi

ताऊ रामपुरिया said...

अंधेरी रात मे भी,
" रोशन रूखे- यार देखा"
शायद ये निगाहे-नाज़ की,
" बीमारी थी"


आज मेरे पास तारीफ़ के लिए अल्फाज नही हैं !
आपमे छुपे शायर को मेरी बंदगी !

राज भाटिय़ा said...

हम तो कायल हे आप की शायरी के.
धन्यवाद

डॉ .अनुराग said...

bahut khoob......

Pramod Kumar Kush ''tanha" said...

Laajaab !!!

डॉ आदित्य शुक्ल said...

Bahut Khub...,
Bahai

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

आपके ब्लॉग पर लगातार खूबसूरत कता पढने को मिल रहे हैं। अच्छा लगता है।

अर्शिया अली said...

सुन्दर कविता।

kmuskan said...

bahut khubsurat..........

योगेन्द्र मौदगिल said...

सीमा जी, ताऊ की और मेरी एक ही बात है.
जो उन्होंने जैसा कहा..
मैं भी वैसा ही कहना चाह रहा था...
बधाई....

makrand said...

needless to say simplly great
and compostion is too good
i need some help to make my blog
like this send some technicals

mukesh said...

bahut acche seema ji,

wesse sach kahu to mujhe lagta hai ki in linoo me kuch or linee jud jayti to ye or kuhb surat ho sakti thii.

महामंत्री - तस्लीम said...

कता की खासियत ही यह होती है कि वह कम शब्दों में अपनी बात कह देता है। और इसमें परफेक्ट हैं।
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फलू का आतंक
कार्ल फ्रेडरिक गॉस

विक्रांत बेशर्मा said...

बहुत ख्होब सीमा जी ...क्या बात कही है !!!

kumar Dheeraj said...

बहुत ही आकषॆक नज्म आपने लिखी है सीमाजी । आभार है

अनिल कान्त : said...

waah ... bahut khoob !!