
बेज़ारी जान की थी या,
किसी गम की गीरफ्तारी थी,
अंधेरी रात मे भी,
" रोशन रूखे- यार देखा"
शायद ये निगाहे-नाज़ की,
" बीमारी थी"
(बेज़ारी - उदासीनता )
(रूखे- यार - प्रेमिका का चेहरा)
http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/09/blog-post_13.html

उम्मीद मुहब्बत प्यार सनम,
क्या सबकुछ है व्यापार सनम???
यह विरह गीत रोना धोना,
जीवन के सुख पर वार सनम
यह तेरा व्योहार सनम ??
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हिन्द-युग्म: सीमा गुप्ता
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रचनाकार: सीमा गुप्ता ,
वाङ्मय हिन्दी पत्रिका SEEMA GUPTA
22 comments:
लाजवाब!
roz nai baat, roz naya khayal,kamal hai
bahut khoobsoorat hai, very nice
" रोशन रूखे- यार देखा"
बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ है,
भावपूर्ण बधाई
बेज़ारी जान की थी या,
किसी गम की गीरफ्तारी थी,
सीमा जी एक बात बताओ कि इतनी गहरी बात दिल में आई कैसे गजब पंक्तियां थोडा और लिखने का प्रयास करो अच्छा लिखोगे
हा हा हा
बहुत खूब
nigaahe-naj patharaa si gayin un par
ye mahbooba bhi to na thi
bejaari pata nahi kab khatam ho gayi
laga muddat se isi rukhe-yaar ki talaash thi
अंधेरी रात मे भी,
" रोशन रूखे- यार देखा"
शायद ये निगाहे-नाज़ की,
" बीमारी थी"
आज मेरे पास तारीफ़ के लिए अल्फाज नही हैं !
आपमे छुपे शायर को मेरी बंदगी !
हम तो कायल हे आप की शायरी के.
धन्यवाद
bahut khoob......
Laajaab !!!
Bahut Khub...,
Bahai
आपके ब्लॉग पर लगातार खूबसूरत कता पढने को मिल रहे हैं। अच्छा लगता है।
सुन्दर कविता।
bahut khubsurat..........
सीमा जी, ताऊ की और मेरी एक ही बात है.
जो उन्होंने जैसा कहा..
मैं भी वैसा ही कहना चाह रहा था...
बधाई....
needless to say simplly great
and compostion is too good
i need some help to make my blog
like this send some technicals
bahut acche seema ji,
wesse sach kahu to mujhe lagta hai ki in linoo me kuch or linee jud jayti to ye or kuhb surat ho sakti thii.
कता की खासियत ही यह होती है कि वह कम शब्दों में अपनी बात कह देता है। और इसमें परफेक्ट हैं।
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फलू का आतंक
कार्ल फ्रेडरिक गॉस
बहुत ख्होब सीमा जी ...क्या बात कही है !!!
बहुत ही आकषॆक नज्म आपने लिखी है सीमाजी । आभार है
waah ... bahut khoob !!
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