"seemadani ke kalam se"

Monday, November 26, 2012

GHAZAL PUBLISHED IN " SAADAR INDIA"

GHAZAL PUBLISHED IN " SAADAR INDIA" "GEET GHAZAL" EDITION NOVEMBER 2012, along with great legenads of literature

Posted by seema gupta at 3:20 PM

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" उसका हर रूप निगाहों में बसा है मेरी , उसका हर रंग भी सदियों से रहा है मुझमें"

" उसका हर रूप निगाहों में बसा है मेरी ,  उसका हर रंग भी सदियों से रहा है मुझमें"

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सीहोर (भोपाल) में मेरे प्रथम काव्य संग्रह " विरह के रंग" का विमोचन

सीहोर (भोपाल) में मेरे प्रथम काव्य संग्रह " विरह के रंग" का विमोचन
एक ख्वाब जो मेरी इन आँखों ने देखा भी नहीं था, मगर सच हो गया 08.05.2010

दुनिया के छूटने का कोई ग़म नही मुझे तुझसे जुदा हुई हूँ ये एहसास है अभी "

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मौत की रगों मे सांसों का लहू शिरकत न करता, उसके अश्कों ने यकीनन मेरे लबो को छुआ होगा.

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दिले-बेताब को बख्श दे अब तो सुकून-ऐ-सुबह,दर्दे-फिराक ने अदा किया है फर्जे-इश्क सारी रात...

दिले-बेताब को बख्श दे अब तो सुकून-ऐ-सुबह,दर्दे-फिराक ने अदा किया है फर्जे-इश्क सारी रात...

सहरा के सर्दो -गर्म ही अब रास आ गए , सीमा किसी चमन के रवादार हम नहीं

सहरा के सर्दो -गर्म ही अब रास आ गए , सीमा किसी चमन के रवादार हम नहीं

तुम मेरे साथ रहो बस्ती में तन्हाई में, तुम मेरे साथ चलो दर्द की गहराई मे

तुम  मेरे  साथ  रहो  बस्ती  में  तन्हाई  में, तुम मेरे साथ चलो दर्द की  गहराई मे
मैं सोचता हूँ अगर यूँ नहीं तो क्या होता ,मेरा नसीब था , तुमको नहीं मिला होता , अब एक दिल पे उदासी है यूँ की जाती नहीं तुम्हारी दीद न होती किसे गिला होता

"बनके नासूर रिसा करती हैं यादें तेरी , और कब तक दिले -बर्बाद को जलता देखूं"

"बनके नासूर रिसा करती हैं यादें तेरी , और कब तक दिले -बर्बाद को जलता देखूं"

"है कहाँ तमन्ना का दूसरा कदम या रब हम ने दश्त -ऐ -इमकान को एक नक्श -ऐ-पा पाया " (Ghalib)
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"मोहब्बतों के हसीं पलों को , वो तितलियों का ख्याल देगा की ख्वाब सारे बस एक शब् में , वो मेरी आँखों

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"कोई तम्मना भी न बहला सकी"

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जिन्दगी की धुप ने झुलसा दिया ,एक शीतल छावं की तलाश है

जिन्दगी  की  धुप  ने  झुलसा  दिया ,एक  शीतल  छावं   की  तलाश  है
रंज उल्फ़त नफरत से निबाह किया,एक दर्द-मंद दील की तलाश है,रास्तों मे मंजिलें भटक गईं ,एक ठहरे गावं की तलाश है

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रात भर चाँद को चुपके से हथेली पे उतारा हमने

रात भर चाँद को चुपके से  हथेली पे उतारा हमने
तेरी यादों की करवटों की तरह यूँ हीं एक टक निहारा हमने

कभी हिज्र हो के विसाल हो नई क़ुर्बतों कि मिसाल हो नया दूरियों में भी हो मज़ा नया क़ुर्बतों में वक़ार ह

कभी हिज्र हो के विसाल हो नई क़ुर्बतों कि मिसाल हो  नया दूरियों में भी हो मज़ा नया क़ुर्बतों में वक़ार ह
तन्हाइयों की हमने ही दुनिया बसाई है , गोशे में खुदके हैं ,सरे -बाज़ार हम नहीं

उदासी काम अपना कर गई शायद उसे पाने की ख्वाहिश मर गयी शायद

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