"हाथ की लकीरों मे"हम तो रहते थे,
"कहीं"
रूह की तहरीरों मे,
"कहीं"लिखें थे,
तेरी हाथ की लकीरों मे ,
हमें हैरत है की,
तुमने नहीं देखा कैसे....
उम्मीद मुहब्बत प्यार सनम,
क्या सबकुछ है व्यापार सनम???
यह विरह गीत रोना धोना,
जीवन के सुख पर वार सनम
यह तेरा व्योहार सनम ??
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हिन्द-युग्म: सीमा गुप्ता
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ख्वाबों के आंगन...-कविता/NAVBHARAT TIMES ,
रचनाकार: सीमा गुप्ता ,
वाङ्मय हिन्दी पत्रिका SEEMA GUPTA
15 comments:
अच्छी रचना बनी है। बधाई
Atma ka sambandh, rooh ki tahreer aur haathon ki lakeer................phir aisee vidambana..................koi itna kareeb ho aur hum use paajaney se chook jaayen!!!
.............aap ki abhivyakti ka jawab naheen..hats-off to you.
वाह सीमा जी..यह हैरत बेहद, कोमल असहासों का सुन्दर प्रस्तुतिकरण है..
बधाई स्वीकारें..
***राजीव रंजन प्रसाद
सुन्दर प्रस्तुतिकरण, बधाई!
सुन्दर प्रस्तुतिकरण, बधाई!
humein hairat hai ki,
tumne nahin dekha kaise???
wah wah...kya vaar kiya hai aapne...bahot khub hai andaz-e-sawal bhi...
bhut sundar. badhai ho.
सुन्दर कविता- बधाई!
लिखे होते जो लकीर में तो मिले होते
रूह में बसे तो किसी गुलाब सा खिले होते
कुछ कमी रह गई होगी लिखने वाले से
वर्ना मिलन के रोज़ यहाँ सिलसिले होते
.....बहुत सुन्दर लिखा है आपने इस लिए उतनी ही सुन्दरता से कमेन्ट करने का दिल हुआ है स्वीकार करें.
बहुत ही सुंदर हैरानी है आपकी बहुत अच्छे
very nice....lage rahooo....roz ka routine ho gaya hain ab mera to , ki ek baar padh lo :)
graet one...
umda...
अति सुंदर कविता बधाई के काबिल हो आप और आपकी रचनाएं
अति सुंदर कविता बधाई के काबिल हो आप और आपकी रचनाएं
अति सुंदर कविता बधाई के काबिल हो आप और आपकी रचनाएं
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